रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और अब एक डॉलर लगभग 90 रुपये के आसपास पहुंच गया है. इस गिरावट ने विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों और उनके परिवारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं. विदेशों में शिक्षा का खर्च पहले ही काफी ज्यादा था, लेकिन रुपये की कमजोरी ने इन खर्चों को और ऊपर धकेल दिया है।
पिछले आठ नौ महीनों में रुपया लगभग 84 रुपये प्रति डॉलर से फिसलकर 90 रुपये तक पहुंच गया. इस गिरावट का सीधा असर उन छात्रों की जेब पर पड़ा है जो अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के देशों में पढ़ाई कर रहे हैं. वहां कॉलेज फीस, रहना खाना, किराया, यात्रा खर्च और इंश्योरेंस सब कुछ डॉलर, पाउंड, यूरो या अन्य विदेशी मुद्रा में चुकाना पड़ता है. रुपये की कमजोरी से ये खर्च अपने आप बढ़ जाते हैं।
विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या अभी भी बड़ी
ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में 7.6 लाख भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए. यह संख्या 2023 के 8.9 लाख से कम है, लेकिन फिर भी यह दिखाता है कि भारतीय परिवारों की विदेश में पढ़ाई की मांग मजबूत बनी हुई है. पांच साल पहले यानी 2020 में यह संख्या सिर्फ 2.6 लाख थी. 2021 में यह 4.5 लाख तक पहुंची, 2022 में 7.5 लाख और 2023 में लगभग 9 लाख।
छात्रों के खर्च अचानक बढ़े
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले से पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए हर नया सेमेस्टर एक नई चुनौती बन गया है. कई छात्रों का कहना है कि मासिक खर्च 20–30 हजार रुपये तक बढ़ गया है. कुल सालाना खर्च 2–3 लाख रुपये अतिरिक्त देना पड़ रहा है. खाना, किराया और यात्रा खर्च सबसे ज्यादा बढ़े हैं. डॉलर और पाउंड में फीस रुपये गिरते ही अपने आप महंगी हो जाती है।
कुछ छात्रों को पार्ट-टाइम जॉब का सहारा
कई छात्र पहले छह महीनों को सबसे कठिन बताते हैं. उन्हें नए माहौल में ढलना होता है और खर्च भी लगातार बढ़ते रहते हैं. कई परिवार बताते हैं कि बच्चे पढ़ाई के साथ-साथ पार्ट–टाइम जॉब भी करते हैं ताकि खर्च का कुछ हिस्सा खुद संभाल सकें।
घरवालों के बजट पर भी दबाव
भारत में मौजूद परिवार एक–एक रुपये का हिसाब लगाते हुए अपने बच्चे की पढ़ाई में पैसा भेजते हैं. घरेलू खर्च, लोन की किस्तें, और बच्चों की विदेश शिक्षा सब कुछ मिलाकर एक बड़ा आर्थिक बोझ खड़ा हो गया है. एक युवक ने सोशल मीडिया पर लिखा 50,000 डॉलर की सालाना फीस जो पहले 41.5 लाख रुपये में पड़ती थी, अब लगभग 44.7 लाख हो गई है. सिर्फ रुपये की गिरावट के कारण सालाना 3 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
कुछ छात्र देश बदलने का विचार कर रहे हैं
कई छात्रों का कहना है कि अगर रुपये की गिरावट जारी रही, तो वे अपनी पढ़ाई के लिए दूसरे देशों पर विचार कर सकते हैं जहां खर्च कम आता है. एक छात्रा जो अमेरिका में मास्टर करने की तैयारी कर रही है ने कहा अब यह तय करना पड़ेगा कि हम क्या अफोर्ड कर सकते हैं. हमारी मंज़िल शायद बदलनी पड़े।
वीजा और प्रोसेसिंग फीस भी महंगी
इमिग्रेशन सलाहकारों ने बताया है कि वीजा फीस और अन्य प्रोसेसिंग चार्ज भी लगभग 4% तक बढ़ गए हैं. अमेरिकी कॉलेजों की औसत फीस में भी हर साल 2-3 लाख रुपये की बढ़ोतरी हो रही है।
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